ई-सत्याग्रह - नव-उपनिवेशवाद की पर्याय विदेशी प्रत्यारोपित तकनीक से लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए एक संकल्प
South Avenue(Central Delhi--110011)BallotBoxIndia treats a district's development like a shared fund, and every socio-political innovator — leader, NGO, business, expert, journalist, activist — like a contributor whose impact we try to measure. The scores here are an experiment to tell apart what an innovator actually moved (नेता का हाथ · their real contribution) from what circumstance carried (हालात · the wave).
About this research
अमेरिकी चुनावों में रूस द्वारा बड़े पैमाने पर सीमा पार से हस्तक्षेप कर, नतीज़े प्रभावित करने के सवाल पर जब मार्क ज़करबर्ग से अमेरिकी सेनेट में पूछा गया तो उन्होंने कहा, कि बस देखते जाइये, अगले साल 2019 में भारत के चुनावों को हम कैसे निष्पक्ष करवाते हैं.
ऐसा दंभ किसी
विदेशी निज़ी कंपनी द्वारा, हज़ारों सालों के इतिहास वाले देश के प्रजातांत्रिक
तरीक़ों के सन्दर्भ में बोला जाना, किसी भी भारतीय के
लिए अपनी फेसबुक द्वारा की गयी दुर्दशा बताने के लिए पर्याप्त है.
ये मौका हमने ही
दिया है, जब हमने प्रत्यारोपित तकनीक के एक भक्षक रूप में फेसबुक को अपने बीच जगह
बनाने और पनपने दिया, जिसने आज हमारे आस पास के जन जीवन को जकड़ रखा है.
आज आम जन में सोशल
मीडिया के पर्यायवाची माने जाने वाले फेसबुक को अगर ध्यान से देखें तो ये असल में
सोशल मीडिया में आयी एक विकृति है, जिसने एक स्वतंत्र
और स्थानीय मीडिया को उठा कर एक बड़ी विदेशी शक्ति के
हाथ में दे दिया है, जिसका मूल स्वरुप ही भ्रष्ट है.
सोशल मीडिया गांधी के समय भी था, जब उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अभियान चलाये थे. यह पैगम्बर साहब, जीसस क्राइस्ट, श्री राम, कृष्ण, वेद व्यास, विवेकानंद जैसे हमारे प्रेरणास्त्रोतों के समय में भी था और इसी के माध्यम से उन सभी ने उस समय की मज़बूत विकृतियों के खिलाफ़ बदलाव लाया था.

फेसबुक इसी
स्वतंत्र सोशल मीडिया पर कुछ उपनिवेशवादी सोच रखने वाले बड़े लोगों का कब्ज़ा है, जिससे अगला गांधी ना पैदा हो सके, और अगर गलती से हो
भी जाए तो उसकी दीनता के साथ लोग खड़े हो कर दो तीन सेल्फी खींचे और लाइक बटोर कर आगे बढ़ जाएँ.
फेसबुक को आज समाज
में फ़ैली कई विकृतियों और सामाजिक जीवन में व्याप्त गिरावट से सीधे रूप से जोड़ा जा
सकता है.
ये ऐसी विकृतियाँ
हैं, जिनका शोषण सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता पर हमला करने के लिए किया जा सकता
है और आज स्थिति ऐसी
बन चुकी है कि कमज़ोर हो चुकी जनता इसका प्रतिरोध करने में अक्षम है.
नीचे इन्हीं कुछ विकृतियों को विस्तार दिया गया है...
तानाशाही और चरम पंथ की वापसी
तकरीबन 2400 साल पहले प्लेटो ने अपनी पुस्तक “रिपब्लिक” में तानाशाही और चरमपंथ के बारे में चेतावनी दी है और कहा है कि...
प्रजातंत्र को एक
अवसरवादी डेमोगोग ना सिर्फ नष्ट भ्रष्ट कर सकता है, बल्कि बड़ी आसानी से जनता “के” शासन को त्वरित जोड़ तोड़ द्वारा जनता “पर” शासन में बदल सकता है.
भले ही एक डेमोगोग “प्रजातान्त्रिक तरीकों” से कुर्सी हासिल
करे, ख़ुद को मसीहा घोषित कर हवाई और लोकलुभावन वादे करे, ख़ासकर मति भ्रम कर देने वाली बातें जो स्वतंत्रता के अपने ही खुशनुमा पर्याय
बना दे.
जो भी ऐसे डेमोगोग
का विरोध करे उसे प्रजा का दुश्मन बता, निष्कासन या काल के
घाट भेज दिया जाए और इस तरह के तरीकों से जब दुश्मनों की संख्या बढे तब एक बड़ी
निज़ी फौज़ आत्मरक्षा के लिए बना ली जाए.
ऐसा डेमोगोग दूसरे
देशों से युद्ध भड़का जनता में अपनी मज़बूत राजा की ज़रुरत बनाये रखेगा. डेमोगोग की
ज़रुरत अपने समर्थकों को डरा हुआ और विपन्न रखने की भी रहती है, जिससे जब कभी भी समर्थक विद्रोह करें तब उनको एक रक्त रंजित तानाशाह की तरह
दबाया जाये.
प्लेटो का डेमोगोग कल्पना
की दुनिया जनता को बेचता है, और सच्चाई का
तिरस्कार करता है. एक समय ऐसा आता है जब आम जन में यथार्थ और सच की भावना के प्रति
ही विद्रोह का भाव आ जाता है, ऐसे में समाज एक “पोस्ट फैक्ट” यानि एक समानांतर यथार्थ की दुनिया में चला जाता है, ऐसे में किसी भी तरह के प्रजातंत्र या उससे जुडी किसी भी तरह के सभ्य संवाद का
कोई मतलब नहीं रह जाता, और पूरी सृष्टि का
अस्तित्व ही संकट में आ जाता है.
आज हम अपने आस पास
प्रजातंत्र या प्रजातान्त्रिक देशों का हाल देखें तो पता चलता है, किस तरह फेसबुक ने प्लेटो के डेमोगोग को शक्तिशाली बनाया है और इस परमाणु
अस्त्रों, ग्लोबल वार्मिंग के युग में आज संसार का अस्तित्व ही
ख़तरे में डाल दिया है.
फेसबुक का जो
कारोबार है, उसके मूल में ही डेमोगोग या इन्फ़्लुएन्सर बैठा हुआ है, जिसको यह अपने कुछ बिकाऊ फालतू के लाइक और फॉलो के
आंकड़ों से सशक्त करता है और अरबों का मुनाफ़ा
कमाता है.
हर तरह की राजनीतिक
पद्दतियों और सहज, सरल सदभाव को बुरी तरह से प्रभावित कर डेमोगोग उसके
डिजिटल क्लोन बनाता है. कैडर प्रथा को बुरी तरह से तहस नहस कर, आम जनता से आने वाली प्रतिक्रिया, जवाबदेही, चेक और बैलेंस को ख़तम करता है.
फेसबुक ना सिर्फ इन
सब भ्रष्ट कार्य कलापों को प्रोत्साहित करता है, बल्कि अगर ध्यान से
इसके गए वर्षों में काम करने के तरीकों को देखें तो यह जान बूझ कर इस तरह के
कार्यों को बढ़ावा दे कर लाभ कमाने के उद्देश्य से बनाया गया प्रतीत होता है.
समाज के सहज-व्यवहार में गिरावट, आध्यात्मिक जडें समाप्ति की ओर
फेसबुक एक खेल की
तरह शुरू हुआ था, जिसमे एक दूसरे के जीवन में तांका झांकी के मुफ़्त
अवसर आम जन को एक बड़े मार्केटिंग के प्रयास के तहत दिए गए थे. तब से ही आम जन में narcissism यानि स्वयं-पूजा और अहंकार में वृद्धि की कई रिसर्च रिपोर्ट्स सामने आयी हैं.
इसमें बने
मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह, प्रभाव जमा कुछ बेच देने की प्रक्रिया ने, व्यक्तियों में व्यापक तौर पर खुद को एक दिखावटी स्वरूप में दिखाने की आदत
डाली है. हर समय ख़ुद का प्रमोशन करने से अहंकार पूर्ण हिंसक
व्यवहार तो बढ़ा ही है, डिप्रेसन या अवसाद के आंकड़ें भी बढे हैं.
पैसा खर्च कर के
स्वयं प्रभुता को सत्यापित करते लाइक्स या फॉलो बटोर, महंगे कैंपेन चला कर भोली जनता को मूर्ख बनाने की प्रक्रिया भी काफ़ी बढ़ी है.
इन्टरनेट तकनीक के नियमों का हनन
फेसबुक की
बंद-बगिया तकनीक इन्टरनेट पर एक लोहे के बड़े से बंद बक्से की तरह है, जिसमे ये सुनिश्चित किया गया है कि अन्दर मिली भगत से भोली जनता के साथ होते
भ्रस्टाचार और अत्याचार के
किस्से बाहर ना आ सके और बड़ी ही सफाई के साथ सबूत भी मिटाए जा सकें.
सरकारों और सभ्य
समाज के लिए किसी भी तरह के नियंत्रण के प्रयास बड़े ही मुश्किल और फेसबुक के ही
रहमो करम पर आधारित हैं. देश विदेश की सीमाएं, इसको और भी मुश्किल
करती हैं.
प्रजातान्त्रिक सत्ता द्वारा अपनी संरक्षित जनता को फेसबुक के हाथों हार जाना
फेसबुक को अपनी
सीमा में पांव ज़माने देने से स्थानीय सरकारों को नियम और नैतिक सत्ता के साथ समाज
को चलाना बड़ा ही कठिन हुआ है. फेसबुक और व्हाट्सएप द्वारा संभव करा दिए गए दंगे, भीड़ द्वारा हत्याएं, अफ़वाहें, ग़लत खबरें का गरमबाज़ार लगातार प्रजातान्त्रिक शासन को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है. अमेरिका, श्रीलंका, भारत इत्यादि के
उदाहरण लें तो जिस तरह अज्ञात एजेंसियों ने प्रजातान्त्रिक संस्थाओं को बिना किसी
दया के दबाया है और जिस तरह जनता के प्रतिनिधि अक्षम, निर्बल और सीधे फेसबुक पर रक्षा के लिए आश्रित नज़र आते हैं, यह बताता है किस तरह सरकारें अपनी जनता को फेसबुक से हार चुकी है, और आज अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए दीनता के साथ फेसबुक के सामने करबद्ध खड़ी
हैं.
पुराने उपनिवेशवाद के प्रारम्भ का शंखनाद
ब्रिटिश शासन के 173 सालों में भारत ने ना सिर्फ अपनी गौरवशाली सभ्यता को खो एक पथ-भ्रमित मानसिकता
को ग्रहण किया, बल्कि बलपूर्वक अपने मानव और प्रकृति के धन को भी ग्रहण किया, जो कि आज एक अनुमान के अनुसार 43 ट्रिलियन डॉलर हैं.. खो दिया.
अपमानित, विपन्न, खिन्नता से भरा, तीन टुकड़ों में
टूटा हुआ देश और आपस में लड़ते और अस्तित्व के लिए जूझते हुए आज भारत बड़ी मुश्किलों
से अपने पैरों पर खड़ा हो, दुनिया में अपनी सही जगह की तरफ़ बढ़ रहा है. एक समय
दुनिया का आध्यात्मिक बल रहा भारत, एक सतत समाज की ओर
कठिनाई के साथ अपने कदम बढ़ा रहा है.
मगर आज जिस तरह
भारत की संप्रभुता और निजता पर आघात हो रहे हैं, भारत के आम और खास जन का
निजी डाटा, चाहे वो नेता हों या अभिनेता या आध्यात्मिक गुरु, प्रचारक इत्यादि बड़े ही महीन रूप में देश के बाहर जा चुका है, उचित नहीं है. इसमें
काफी समानांतर है - उस ब्रिटिश राज के समय से जब भारत के प्रिंसली एस्टेट के
राजाओं का निजी व्यवहार, शयन कक्ष की खबरें अंग्रेजों द्वारा इनको काबू में
रखने के लिए इस्तेमाल की जाती थी.
अगर भारत पर हो रहे
इस नव-उपनिवेशवाद के तरीकों को सैन्य तकनीक में हो रही लगातार नयी प्रगति के साथ
जोड़ें, जैसे अंतरिक्ष कार्यक्रम, ड्रोन, नियंत्रित सर्जिकल मिसाइल इत्यादि तो किसी भी
रणनीतिज्ञ को इसका अंदाज़ा लगाना बड़ा आसान है कि किस तरह भारत एक झटके में अपने
पुराने स्याह-युग में वापस लौट सकता है.
अर्थव्यवस्था का नुकसान और उपनिवेशवादी महाकाय शक्तियों का उदय
अमेरिका के सिलिकॉन वैली से निकली ये तकनीकें अपनी जड़ें विदेशी एजेंसियों द्वारा जासूसी के उन्नत तरीक़ों में रखती हैं. आम जनता को मुफ्त में दी जा रही ये सुविधाएँ बड़ी महंगी हैं और आम जनता में इसको स्वीकृत करवाने के लिए काफी बड़े महंगे अभियानों द्वारा ज़मीन पर उतारी गयी हैं. इन्होंने अपने किसी भी प्रतिद्वंदी संस्था को या तो रौंद डाला है या ख़रीद लिया है.

मुफ़्त में दी जा
रही ये सुविधाएँ स्थानीय सरकारों के लिए एक बड़ा आयकर का नुकसान हैं. अगर फेसबुक को ही देखें तो अगर 295 मिलियन उपभोक्ता यदि
सिर्फ 100 डॉलर साल का भी देते तो कमाई 29.5 बिलियन डॉलर की होती है, जिस पर GST का 18% लगा दें तो 5.3 बिलियन डॉलर का
टैक्स रेवेन्यु. ये सारा सरकारी घाटा किसी न किसी रूप में सीधे फेसबुक
के खज़ाने में ही जा रहा है और यही वो पैसा है, जिसका दंभ भर के ज़करबर्ग साहब भारत
के चुनाव सही तरीक़े से करवा देने का दावा करते हैं.
भारत के अपने स्थानीय उद्यम और तकनीकी रीढ़ का हनन
जहाँ सरकारें खरबों
का घाटा उठा रही हैं, एक भारतीय तकनीकी क्षेत्र से जुड़े उद्यमी के लिए एक ईमानदार
कारोबार करना और अपने समाज को स्थानीय तकनीकी सुविधा एक सही मूल्य पर प्रदान करना
बड़ा मुश्किल हो गया है. आम जन के मन में तकनीक यानि मुफ़्त का भाव आ गया है.
भारत के इंजीनियर
और उद्यमी बड़े से बड़ा तकनीकी सिस्टम बनाने में सक्षम हैं, मगर सिलिकॉन वैली से निकली प्रत्यारोपित सर्वभक्षक तकनीक हमारे स्वतन्त्र
कारोबार को जमने ही नहीं देती.
भारतीय इंजीनियर और
उद्यमियों को फेसबुक और सिलिकॉन वैली की जन-भक्षक तकनीक और सोच का साथ देना पड़ता
है, अपने ही लोगों को ख़तरे में डाल विदेशी खज़ाना भरने की
प्रक्रिया में शामिल होना पड़ता है.
फेसबुक इत्यादि को
अपने देश में काम करने देने से भारत ना सिर्फ अपने इंजीनियर खो रहा है, बल्कि अपना खुद का शक्तिशाली तकनीकी रीढ़ बनाने का मौका भी पूरी तरह से गवां दे
रहा है.
आज हमें सोचना है, जब हम डिजिटल तकनीक देश के हर कोने में पहुंचा कर लोगों को इसकी आदत डलवा रहे हैं, क्या हमारी डिजिटल तकनीक की चाबी विदेशी एजेंसियों के पास है?
तकनीक जो की सिर्फ अमीर प्रत्याशी की मदद के लिए और चुनावों पर कब्ज़ा कर लेने के लिए ही बनी है
फेसबुक 2008 से ही बड़े पैसे वाले उम्मीदवारों के साथ मिल कर काम कर रहा है और इसे स्टैण्डर्ड
प्रैक्टिस का नाम देता रहा है. अरबों मासूम लोगों को अपने मनोवैज्ञानिक
चक्रव्यूहों में बाँध उनकी सारी सूचना बड़े फंडेड राजनीतिज्ञों को सीधे और अपने
कैंब्रिज एनालिटिका जैसे सहभागियों के साथ मिल कर बेच रहा है.
अभी हाल फ़िलहाल के
ब्रिटिश संसद में उठे सवालों को देखें तो पता चलता है किस तरह फेसबुक ने अपने कुछ
चुनिन्दा साथियों के लिए अलग से कॉन्ट्रैक्ट बना कर उनको लोगों की सूचना चुनाव या
मोनोपोली बना कर मार्किट कब्ज़ाने के लिए बेचीं है.
ट्रम्प जी के चुनाव
अधिकारियों की मानें तो जिस तरह दिन में 50,000 से 60,000 विज्ञापन के अलग
अलग स्वरूप, टारगेट के अनुसार लोगों को दिखाए गए और उसमे फेसबुक के
तकनीकी स्टाफ की सीधी साझेदारी थी. एक बड़े ही ख़तरनाक घालमेल की और इशारा करता है.
ऐसा ही तरीका रूसी IRA (Internet Research Agency) द्वारा अमेरिकीचुनाव में करोड़ो लोगों को टारगेट करने के लिए किया गया था.
यह सब सिर्फ फेसबुक
के राजनीतिक प्रचार-प्रसार के मूल में होने और उसके लालच को सत्यापित ही करता है.
समाप्त होती पत्रकारिता, टूटता सूचना तंत्र और प्रेस
फेसबुक ने
पत्रकारों को पीढ़ियों को पथ भ्रष्ट किया है, आज जब पत्रकार अपनी
लोकल बीट पर होने की जगह भांति भांति के क्लिक-बेट बना रहे हैं, जिसका समाज के लिए सिर्फ समय की बर्बादी और भ्रम फ़ैलाने के अलावा कोई उपयोग
नहीं है, तब वो अपनी समाज की एक धुरी, जिसकी भूमिका प्रशासन के
सामने चेक और बैलेंस की है..को छोड़ रहा है.
फेसबुक किसी भी
अख़बार से विज्ञापन के लिए सीधे प्रतिस्पर्धा करता है, जिससे अच्छे भले अख़बारों का काम करने का तरीका ही बदल गया है.
छोटे अख़बार या तो
बंद हो रहे हैं या फिर ‘येल्लो जर्नलिज्म” की दिशा में जा रहे हैं, टेबलायड बनते जा रहे हैं.
आज के अख़बार और
पत्रकार अपनी स्वतंत्रता खो, अपने मूल स्वभाव
में एक बड़ी गिरावट ला रहे हैं. जिससे मीडिया में
फेसबुक और इस जैसी विदेशी संस्थाओं का भ्रष्ट प्रभाव दिखता है.
छोटे उद्योग धंधे बंदी की ओर, भारतीय आजीविका के स्त्रोतों का ह्रास
छोटे स्थानीय
उद्योग धंधो को अपने ग्राहकों से जुड़ने के लिए फेसबुक जैसी संस्थाओं को कोई
आवश्यकता नहीं है. फेसबुक बाज़ार में एक बलपूर्वक प्रत्यारोपित, उपनिवेशवादी सोच का उपक्रम है, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था और
स्थानीय आजीविका के लिए बड़ा ख़तरा उत्पन्न किया है.
एक छोटा स्थानीय
व्यापार बड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार द्वारा हज़म कर लिया जाता है, फेसबुक ना सिर्फ छोटे व्यापारी के ग्राहक सीधे बड़े अंतर्राष्ट्रीय और फेसबुक
के सिस्टम से जुड़े व्यापारियों को बेच देता है, ग्राहकों को ऐसे
बड़े बड़े विज्ञापन एजेसियों के जाल में फंसा देता है, जिससे वो फिर बाहर
निकल नहीं पाता.
आज जहाँ फेसबुक
हिंदुस्तान और विश्व की प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाओं को नष्ट भ्रष्ट कर रहा है, इसकी भौतिक सफलता का एक ही राज़ है, आम जन की स्वाभाविक
कमजोरियों को शोषण कर पाना, जिनके बारे में हर आध्यात्मिक
या धर्म की किताब ने आगाह और शोषण वर्जित किया है.
फेसबुक और इस जैसे
विदेशी उपनिवेशवादी तकनीकी प्रत्यारोपण बड़े ही मज़बूत हैं और इनकी जड़ें गहरी
हैं. इनको हमारी ज़मीन से उखाड़ फेंकने का सिर्फ एक ही तरीका है. आम जन का
सत्य-आग्रह.
आम जन
को बोलना होगा - अब बहुत हो गया, फेसबुक, मुझे तो अब माफ़ ही करो.
ई-सत्याग्रह कैसे करें?
आपके भविष्य की
कीमत आंकी जा चुकी है और इन्वेस्टमेंट हो चुके हैं. सब तैयार हैं और सवाल सबके सामने
एक ही है कि 2019 के चुनावों में किसे वोट करें.
मगर जहाँ आप अगले
पांच साल के लिए अपने सार्वजनिक जीवन को चलाने के लिए एक नेता चुनने जा रहे हैं, अपने कम से कम पांच दिन इस सवाल का जवाब पाने के लिए भी लगाएं कि क्या आपका
वोट सही जानकारी पर आधारित है.
इसके लिए आपको एक
व्रत लेना होगा, जिसके दस नियम हैं और अवधि एक महीना. सफलता पूर्वक
अगर हर नागरिक इसे करे तो भारत संभल पाएगा, नहीं तो आने वाला
समय बुरा है. आगामी चुनाव के एक महीना पहले से...
1. गूगल, फेसबुक,
ट्विटर, व्हाट्सएप का पूरी तरह से त्याग कर दें.
2. टेलीविज़न, रेडियो पर सिर्फ पुराने गीत सुनें, किसी भी स्टार एंकर
को गलती से भी ना सुनें. चौबीस घंटे न्यूज़ चैनल का पूरी तरह परित्याग करें, अख़बार बंद कर दें, सिर्फ दिन में एक बार खबरें सुनें या ये ज़िम्मेदारी घर के किसी बड़े को दे दें.
3. सिनेमा पूरी तरह
छोड़ें, सिर्फ 90 से पहले का ही
सिनेमा देखें.
4. छोटे बड़े किसी
भी नेता की रैली या रैला में कतई ना जाएँ.
ऊपर
दिए गए चार कार्य आप रोज़मर्रा के कार्य करते हुए कर सकते हैं, अब कुछ चीज़ें जो आपने
करनी हैं...
1. चुनाव आयोग से अपने इलाके के उम्मीदवारों की लिस्ट निकलवा लें. अपने इलाक़े में किसी नौजवान को ये ज़िम्मेदारी दें और वो ये लिस्ट सबको ला के दे या किसी सार्वजानिक जगह पर लगा दे.
2. बाइक रैली, शोर शराबा, शक्ति प्रदर्शन करते नेता को सीधे लिस्ट से काट दें.
3. उस व्यक्ति को
देखें, जो इलाके में कम से कम पांच साल से एक्टिव हो.
4. उस व्यक्ति को
देखें जो सुलभ हो, ऑफिस जा कर या फ़ोन कर के देखें कि आप बात कर सकते हैं
अथवा नहीं, क्या व्यवस्था है? क्या वह आपके समय की कीमत पहचानता
है?
5. और कुछ सवाल
पूछें. उनके बारे में, जैसे राजनीति में आने का
कारण? क्षेत्र की पांच मुख्य समस्याएँ? देश की पांच मुख्य समस्याएँ? इस वैश्विक
परिदृश्य में भारत के लिए उनकी योज़ना आदि.
6. अब अपने बंधु
बांधवों, रिश्तेदारों के साथ बैठ कर अपने देश के भविष्य के लिए
इन उम्मीदवारों के बारे में आमने सामने बात करें और सही निर्णय खुद लें.
इन दस नियमों का पालन करने के बाद ही वोट करें.
आपका यह कह देना कि "आखिर हम कर ही क्या सकते हैं", यह सरासर गलत है. लोकतंत्र हम सभी से मिलकर बनता है, किसी सरकार से या बाहरी ताकत से नहीं..जनतंत्र सबसे बड़ा तंत्र है और इस तथ्य को हमे स्वीकारना होगा. हमारी अनभिज्ञता, अज्ञानता और आपसी मनमुटाव का लाभ अतीत में भी बाहरी ताकतें उठा चुकी हैं, जिसका असर आज तक हमारा देश भुगत रहा है..उन्हीं गलतियों का पुन: दोहराव नहीं करते हुए हमें सिरे से इन थोपी गयी विदेशी तकनीकों को उखाड़ फेंकना होगा. मुश्किल होगा, परन्तु असंभव तो कतई नहीं. तो आइये, एक व्रत लें..ई-सत्याग्रह से जुड़कर सही मायनों में अपनी भारतीयता के परिचायक बनें. यदि आपके पास भी इस विषय से जुड़े कुछ सुझाव अथवा विचार हैं, तो साझा अवश्य करें. आप http://esatyagraha.org/ के माध्यम से भी हमसे जुड़ सकते हैं.
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